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ग़ज़ल
कहो ये ख़िज़्र से भटके न यूँ ज़माने में
यहाँ से आब-ए-बक़ा-ए-दवाम ले साक़ी
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
ग़ज़ल
ऐ 'बक़ा'-ए-कारवाँ इस रेख़्ते की हर रदीफ़
गरचे है बे-कार पर बतला कहाँ बे-कार है
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
पाँव रखता ही नहीं नाज़ से बाला-ए-ज़मीं
कफ़-ब-कफ़ बज़्म में साक़ी की रवाँ है शीशा
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
जो तुम और सुब्ह और गुलनार-ए-ख़ंदाँ हो के मिल बैठे
तो हम भी उन में बा-चाक-ए-गरेबाँ हो के मिल बैठे
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
नालाँ हम अपने अश्क के हाथों थे अब 'बक़ा'
बहने लगें हैं लख़्त-ए-जिगर यक-न-शुद दो-शुद
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
दाम-ए-बला से अब 'बक़ा' हम से असीर कब छुटें
रिश्ता-ए-ग़म से गुथ गए बाल-ब-बाल पर-ब-पर
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
नहीं मिलने की 'बक़ा' हम को ब-जुज़ कुंज-ए-मज़ार
जा-ए-आसूदगी इस गुम्बद-ए-गर्दां के तले
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
अश्क से ख़ामा रहे जो मिरे बस में न 'बक़ा'
गो तब-ए-तन से ये बब्बल न जले ख़ुश्क तो हो
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
बाक़ी रहे न बादा तो उस के एवज़ में आब
ले ख़ुम की शुस्त-ओ-शू से क़दह और क़दह से हम