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ग़ज़ल
वो तो अंदर की उदासी ने बचाया वर्ना
उन की मर्ज़ी तो यही थी कि शगुफ़्ता हो जाऊँ
अहमद कमाल परवाज़ी
ग़ज़ल
भूल जाना था तो फिर अपना बनाया क्यूँ था
तुम ने उल्फ़त का यक़ीं मुझ को दिलाया क्यूँ था
सबा अफ़ग़ानी
ग़ज़ल
फूल चुनना भी अबस सैर-ए-बहाराँ भी फ़ुज़ूल
दिल का दामन ही जो काँटों से बचाया न गया
मुईन अहसन जज़्बी
ग़ज़ल
ऐ ख़ुदा जिस्म में तू ने ये बनाया क्या है
दिल तो ये है ही नहीं फिर ये धड़कता क्या है