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ग़ज़ल
बर-सर-ए-आम इक़रार अगर ना-मुम्किन है तो यूँही सही
कम-अज़-कम इदराक तो कर ले गुन बे-शक मत मान मिरे
कौसर नियाज़ी
ग़ज़ल
खुल कर न सर-ए-आम हो इज़हार भले ही
है बुग़्ज़ करें हम से वो इंकार भले ही