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ग़ज़ल
ज़िंदगी भर मैं खुली छत पे खड़ी भीगा की
सिर्फ़ इक लम्हा बरसता रहा सावन बन के
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ग़ज़ल
ये कैसे कोह के अंदर मैं दफ़्न था 'बानी'
वो अब्र बन के बरसता रहा है मेरे लिए
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
न ग़म फ़ुर्सत ही देता है न आँसू बंद होते हैं
बरसता जा रहा है मेंह बदली बनती जाती है
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
आशिक़ों की आँख से हर दम बरसता है लहू
रंग पर है आज-कल मेहंदी तुम्हारे हाथ में