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ग़ज़ल
हस्सास हो दुनिया तो जो नश्तर से है मख़्सूस
वो काम भी मैं बर्ग-ए-गुल-ए-तर से निकालूँ
माहिर अब्दुल हई
ग़ज़ल
ऐ सबा दे तू मिरे सोख़्ता-जानों को ख़िराज
उन की तुर्बत पे ही कुछ बर्ग-ए-गुल-ए-तर रख दे
शाहिद कमाल
ग़ज़ल
बर्ग-हा-ए-गुल-ए-तरि कैसे बिखर जाते हैं
गिर्या-ए-ए-बुलबुल-ए-नालाँ में असर होता है
अब्दुल मन्नान बेदिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
सरवत हुसैन
ग़ज़ल
शमीम-ए-ज़ुल्फ़ ओ गुल-ए-तर नहीं तो कुछ भी नहीं
दिमाग़-ए-इश्क़ मोअत्तर नहीं तो कुछ भी नहीं