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ग़ज़ल
देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं
मैं ने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
ज़माना बरसर-ए-पैकार है पुर-हौल शो'लों से
तिरे लब पर अभी तक नग़्मा-ए-ख़य्याम है साक़ी
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
उस को था सख़्त इख़्तिलाफ़ ज़ीस्त के मत्न से सो वो
बर-सर-ए-हाशिया रहा और कमाल कर गया
पीरज़ादा क़ासिम
ग़ज़ल
तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद
हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद