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ग़ज़ल
शाह-ए-गुल का हुक्म सय्यारों के ये है बाग़ में
जो न पी कर आए मय नौकर नहीं बरतर्फ़ है
वलीउल्लाह मुहिब
ग़ज़ल
किसी कम-ज़र्फ़ को बा-ज़र्फ़ अगर कहना पड़े
ऐसे जीने से तो मर जाने को जी चाहता है
कफ़ील आज़र अमरोहवी
ग़ज़ल
तकल्लुफ़-बर-तरफ़ तुम कैसे मा'बूद-ए-मोहब्बत हो
कि इक दीवाना तुम से होश में लाया नहीं जाता
मख़मूर देहलवी
ग़ज़ल
तकल्लुफ़ बरतरफ़ नज़्ज़ारगी में भी सही लेकिन
वो देखा जाए कब ये ज़ुल्म देखा जाए है मुझ से
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
रहे उस शोख़ से आज़ुर्दा हम चंदे तकल्लुफ़ से
तकल्लुफ़ बरतरफ़ था एक अंदाज़-ए-जुनूँ वो भी
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
कहाँ तक कुछ न कहिए अब तो नौबत जान तक पहुँची
तकल्लुफ़-बर-तरफ़ ऐ ज़ब्त नाला दिल से निकलेगा
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
तकल्लुफ़-बर-तरफ़ है जाँ-सिताँ-तर लुत्फ़-ए-बद-ख़ूयाँ
निगाह-ए-बे-हिजाब-ए-नाज़ तेग़-ए-तेज़-ए-उर्यां है