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ग़ज़ल
न बरतो उन से अपनायत के तुम बरताव ऐ 'मुज़्तर'
पराया माल इन बातों से अपना हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
अमीर रज़ा मज़हरी
ग़ज़ल
किसी से मेहर चाहो जब कि उस से बे-रुख़ी बरतो
तुम्हें मा'लूम है नाँ मेरी जाँ ऐसे नहीं होता
शम्स ख़ालिद
ग़ज़ल
आज उस फूल की ख़ुशबू मुझ में पैहम शोर मचाती है
जिस ने बे-हद उजलत बरती खिलने और मुरझाने में
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
मुकम्मल किस तरह होगा तमाशा बर्क़-ओ-बाराँ का
तिरा हँसना ज़रूरी है मिरा रोना ज़रूरी है