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ग़ज़ल
और क्या इस से ज़ियादा कोई नरमी बरतूँ
दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
तुम्हारी बे-रुख़ी तुम से खरीदूँ और बरतूँ मैं
मगर तय कोई भी क़ीमत नहीं हो पाई कोशिश की
नासिरा ज़ुबेरी
ग़ज़ल
ये मेरी मर्ज़ी मैं जिस से रिआयतें बरतूँ
ये मुझ पे है कि मैं कितना किराया ले रहा हूँ
मोहम्मद आमिर आवान
ग़ज़ल
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
थीं बनात-उन-नाश-ए-गर्दुं दिन को पर्दे में निहाँ
शब को उन के जी में क्या आई कि उर्यां हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ऐ इश्क़ ये सब दुनिया वाले बे-कार की बातें करते हैं
पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
सिर्फ़ ज़ाहिर हो गया सरमाया-ए-ज़ेब-ओ-सफ़ा
क्या तअ'ज्जुब है जो बातिन बा-सफ़ा मिलता नहीं
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
हम ने काटी हैं तिरी याद में रातें अक्सर
दिल से गुज़री हैं सितारों की बरातें अक्सर