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ग़ज़ल
मुझ से आँखें फेर के तू ने ये मुश्किल भी आसाँ कर दी
वर्ना तेरे ग़म के बदले लेता कौन बसेरे दिल में
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
सपनों के रैन-बसेरे में सदियों से बड़ा सन्नाटा है
आँखों में नींद सुलगती है अब ख़्वाब कोई दिखलाओ नहीं
अख़्तर आज़ाद
ग़ज़ल
कोई हमें भी ये समझा दो उन पर दिल क्यूँ रीझ गया
देखी चितवन बाँकी छब वाले बहतेरे फिरते हैं