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ग़ज़ल
नक़्श सारे ख़ाक के हैं सब हुनर मिट्टी का है
इस दयार-ए-रंग-ओ-बू में बस्त-ओ-दर मिट्टी का है
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
वस्ल की शब में किया मुर्ग़-ए-सहर का बंद-ओ-बस्त
नारा-ए-अल्लाहु-अकबर का है धड़का एक और
आग़ा अकबराबादी
ग़ज़ल
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
नख़चीर हूँ मैं कश्मकश-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र का
हक़ मुझ से अदा हो न दर-ओ-बस्त-ए-हुनर का