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ग़ज़ल
बज़्म-ए-अज़ा-ए-दोस्त में ग़म न सही तरब सही
हँस न सको जो खुल के तुम तो ख़ंदा-ए-ज़ेर-ए-लब सही
रशीद रामपुरी
ग़ज़ल
बज़्म-ए-‘अज़ा बनी हुई है बज़्म-ए-ज़ौक़-ओ-शौक़
दौर-ए-नशात मोजिब-ए-दौरान-ए-सर है आज
रशीद शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे दोस्तों से भी कि देखे हैं
लिबास-ए-दोस्ती में कितने मार-ए-आस्तीं मैं ने
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
मैं 'बज़्म' सोज़-ए-तग़ाफ़ुल से जल बुझा लेकिन
उसे न ज़हमत-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दी मैं ने
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
वो 'उम्र 'बज़्म' कि जिस का सुराग़ ही न मिला
उस उम्र-ए-रफ़्ता की इक यादगार दिल ही तो है
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
गुरेज़ 'बज़्म' ज़रूरी है इल्तिफ़ात में भी
हो रस्म-ओ-राह तो हद से कभी बढ़ूँ भी नहीं
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
न रास आई कभी मुझ को बज़्म-ए-कम-नज़राँ
'फ़ज़ा' भी बैठ के इन पागलों में क्या करता
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
यूँ तो चेहरे पे सजा रक्खी है इक बज़्म-ए-तरब
कितने मक़्तल हैं मिरे सीने के अंदर देखो
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
उफ़ रे शोख़ी की अदा बज़्म-ए-अज़ा से मेरी
मुस्कुराता हुआ वो फ़ित्ना-ए-दौराँ निकला