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ग़ज़ल
सहल हो जाएगी मुश्किल ज़ब्त सोज़ ओ साज़ की
ख़ून-ए-दिल को आँख से जिस रोज़ बहना आ गया
अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
ज़िंदगी से क्या लड़ें जब कोई भी अपना नहीं
हो के शल धारे के रुख़ पर हम को बहना आ गया
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
जब हवा के रुख़ पर ही कश्तियों को बहना था
तुम ने बादबानों को क्यूँ खुला नहीं रक्खा
भारत भूषण पन्त
ग़ज़ल
'मज़हर' छुपा के रख दिल-ए-नाज़ुक को अपने तू
ये शीशा बेचना है किसी मीरज़ा के हाथ
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
बा'द ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा
हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
समुंदर एक ठहरा सा अभी तक है तिरे अंदर
नदी बन कर मिरा बहना तुझे मिलने की कोशिश में
दर्शिका वसानी
ग़ज़ल
मोहब्बत के मराहिल हों या मैदान-ए-अदावत हो
कभी जज़्बात में बहना मुझे अच्छा नहीं लगता
मोहम्मद नईम जावेद नईम
ग़ज़ल
मुफ़्लिसी ऐसी अदू को भी न बख़्शे मौला
बेचना हो जो चराग़ाँ रौशनी की ख़ातिर
आदित्य श्रीवास्तव शफ़क़
ग़ज़ल
बेचना तो है नहीं ईमान फिर भी बोलिए
इस का बाज़ारों में हम को दाम क्या मिल जाएगा