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ग़ज़ल
किसी दिन देख लो आलम मिरी बेताबी-ए-दिल का
तमाशा देखना मंज़ूर है गर रक़्स-ए-बिस्मिल का
मुंशी शिव परशाद वहबी
ग़ज़ल
फ़ज़ा-ए-क़ुर्ब में बेताबी-ए-दिल बढ़ती जाती है
मोहब्बत की तड़प मंज़िल-ब-मंज़िल बढ़ती जाती है