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ग़ज़ल
मेरी पर्वाज़ किसी को नहीं भाती तो न भाए
क्या करूँ ज़ेहन 'मुज़फ़्फ़र' मिरा जिब्रीली है
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
ये अदब का है मक़ाम अब रहने दे ये मशवरे
'अक़्ल लाज़िम है ख़मोशी दिल को जब भाए कोई
प्रियंवदा इल्हान
ग़ज़ल
हमें न सरगम न राग आए हमारी आवाज़ किस को भाए
हमारे शे'रों में तल्ख़ियाँ हैं ज़माना मीठी सदाएँ माँगे
नसीम निकहत
ग़ज़ल
खोल के घूँघट के पट प्यार से करती है प्रणाम मुझे
भोर भए जब नीर भरन को वो पनघट पर आती है