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ग़ज़ल
मेहरबानी की तरह पहली न भूलो यक-ब-यक
बैत-ए-अबरू कूँ तुम अपनी ताज़ा मज़मूँ मत करो
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
अपने अंदर बाहर ''जम जम फैले मुश्क-नसीबो दी''
चादर का उजला-पन भूलो इत्र न छिड़को पसीने पर
प्रेम कुमार नज़र
ग़ज़ल
ये कैसा ख़ौफ़ क्यों बेदाद फ़रमाई नहीं जाती
अजी भूलो क़यामत को अभी आई नहीं जाती