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ग़ज़ल
वो याद के साहिल पर सारे मोती बिखराए बैठी थी
इक लहर लहू में उट्ठी थी मुझे ताज़ा-दम करने के लिए
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
बिखराए बाल देख लिया किस को बाम पर
हर वक़्त हाए ज़ुल्फ़ है हर लहज़ा हाए ज़ुल्फ़
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
रुख़ पर जो सियह-ज़ुल्फ़ को को बिखराए हुए हैं
वो चौदहवीं के चाँद हैं गहनाए हुए हैं
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
मोहम्मद अहमद रम्ज़
ग़ज़ल
गीत बिखराए थे मैं ने राह-ए-उल्फ़त में कभी
अब शिकस्ता-साज़ हूँ वो नग़्मगी बाक़ी नहीं
कृष्ण प्रवेज़
ग़ज़ल
जाने किस शाम-ए-जवानी की तमन्ना हैं उन्हें
चले हैं ज़ुल्फ़ों को बिखराए हुए ये चेहरे