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ग़ज़ल
हम कि दम तोड़ती क़द्रों के अमीं हैं हम से
बिंत-ए-हव्वा का खुला सर नहीं देखा जाता
उमैर अली अंजुम
ग़ज़ल
है बिंत-ए-हव्वा मिरे ही बदन का इक हिस्सा
अगर मैं उस को पटाऊँ किसी के बाप का क्या
वहिद अंसारी बुरहानपुरी
ग़ज़ल
वो बिंते-ए-हव्वा को गो नज़र से गिरा रहे हैं
मगर वो कहती है रिफ़अ'तों में तुम्हें मिलूँगी
नजमा शाहीन खोसा
ग़ज़ल
जो पहले हथकड़ी और बेड़ियाँ थीं बिंत-ए-हव्वा की
अब उन की शक्ल के अहल-ए-जहाँ ज़ेवर बनाते हैं
हिना रिज़्वी
ग़ज़ल
मैं बिंत-ए-हव्वा इक दिन में बदल दूँगी ज़माने को
मुझे मत क़ैद कर नाज़-ओ-अदा की दास्तानों में
इरुम ज़ेहरा
ग़ज़ल
इस क़दर मज़बूत मौसम पर रही किस की गिरफ़्त
मैं कि मुझ से सीना-ए-आब-ओ-हवा रौशन हुआ