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ग़ज़ल
गिर जादू-मंतर सीखोगे तो सेहर हमारी नज़रों का
इस कूचे में बिठलावेंगे फिर कहिए क्यूँकर आओगे तुम
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
अजब क्या है तिरी ख़ुश्की की शामत से जो तू ज़ाहिद
नहाल-ए-ताक बिठलावे तो वो मिसवाक हो जावे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल
क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया
हाए क्या बैठे-बिठाए तुझ को ऐ दिल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
ग़ज़ल
रसा चुग़ताई
ग़ज़ल
ये ग़ज़ब बैठे-बिठाए तुझ पे क्या नाज़िल हुआ
उठ चला दुनिया से क्यूँ तू तुझ को ऐ दिल क्या हुआ
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
कह ब-तब्दील-ए-क़वाफ़ी ग़ज़ल इक और भी 'ज़ौक़'
देखें बिठलाए है किस तरह से तू टूट गए