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ग़ज़ल
हम कि जिन्हें तारे बोने थे हम कि जिन्हें सूरज थे उगाने
आस लिए बैठे हैं सहर की जलते दिए बुझा देने से
जलील ’आली’
ग़ज़ल
काँटे बोने वाले सच-मुच तू भी कितना भोला है
जैसे राही रुक जाएँगे तेरे काँटे बोने से
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ग़ज़ल
कॉलेज का दालान नहीं है प्यारे ज़ालिम दुनिया है
और यहाँ सच बोलने वाला सच में सब से झूटा है
आफ़्ताब शकील
ग़ज़ल
मुझे अब आ गए हैं नफ़रतों के बीज बोने
सो मेरा हक़ ये बनता है कि सरदारी करूँगा