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ग़ज़ल
ब्रेक-अप का ग़म तो था ही मुझे अब ये ग़म भी है
ब्रेक-अप के बा'द लगने लगी है वबाल तू
गौरव त्रिवेदी
ग़ज़ल
ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ
बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है
मुनव्वर राना
ग़ज़ल
यूँ है उस की बज़्म-ए-तरब में इक दिल ग़म-दीदा जैसे
चारों जानिब रंग-महल हैं बीच में इक वीराना है