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ग़ज़ल
बुलाते क्यूँ हो 'आजिज़' को बुलाना क्या मज़ा दे है
ग़ज़ल कम-बख़्त कुछ ऐसी पढ़े है दिल हिला दे है
कलीम आजिज़
ग़ज़ल
बज़्म-ए-दुश्मन में बुलाते हो ये क्या करते हो
और फिर आँख चुराते हो ये क्या करते हो
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
ये मिरा वहम है या मुझ को बुलाते हैं वो लोग
कान बजते हैं कि मौज-ए-गुज़राँ बोलती है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
हमें बज़्म-ए-अदू में वो बुलाते हैं तमन्ना से
करम ऐसा भी होता है सितम ऐसा भी होता है