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ग़ज़ल
हम देखते हैं तुम में ख़ुदा जाने बुतो क्या
इस भेद को अल्लाह की क़सम कह नहीं सकते
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
ख़ुदा-नुमा है बुत-ए-संग-ए-आस्ताना-ए-इश्क़
चलूँगा पा-ए-निगह बन के सू-ए-ख़ाना-ए-इश्क़
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
ग़ज़ल
नाज़ भी तुम को मिला अंदाज़ भी तुम को मिले
क्या बुतो अल्लाह भी देता है सूरत देख कर
नातिक़ गुलावठी
ग़ज़ल
बुतों के होते जो मह पर निगाह करते हैं
क़सम ख़ुदा की बड़ा ही गुनाह करते हैं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
दीद-ए-सनअ'त से है याँ ग़ायत-ए-दीद-ए-सानेअ'
ऐ बुतो शेफ़्ता-ए-हुस्न-ए-ख़ुदा-दाद हैं हम
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
दिल की क्या अस्ल है पत्थर भी पिघल जाएँगे
ऐ बुतो तुम मिरे नालों में असर होने दो