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ग़ज़ल
दुआओं की ज़रूरत है दवा में कुछ नहीं रक्खा
चची में जान बाक़ी है चचा में कुछ नहीं रक्खा
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
न बाप माँ से न बाजी चची चचा से ग़रज़
ग़रज़ है अपनी तो उस बे-ग़रज़ ख़ुदा से ग़रज़
शैदा इलाहाबादी
ग़ज़ल
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ