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ग़ज़ल
जल जल बुझ गई कोंपल कोंपल क्या क्या अरमाँ ख़ाक हुए
आँखें तो भर लाए प बादल बरसे छम-छम दूर ही दूर
ज़िया जालंधरी
ग़ज़ल
जाम-ब-जाम लगी हैं मोहरें मय-ख़ानों पर पहरे हैं
रोती है बरसात छमा-छम देखने वाले देखता जा
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
ख़ुशी का वक़्त है और आँख पुर-नम होती जाती है
खिली है धूप और बारिश भी छम-छम होती जाती है
सदा अम्बालवी
ग़ज़ल
बीते सावन कह रहे हैं ये छमा-छम थे कभी
अब तो हैं गोया फ़क़त किन-मिन ये मेरे रात-दिन