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ग़ज़ल
चप्पे चप्पे पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक
दफ़्न होगा कहीं इतना न ख़ज़ाना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
बच के कहाँ जाओगे आख़िर तुम इतने चालाक नहीं
दश्त के चप्पे चप्पे पर तो बिछा हुआ है दाम मिरा
औरंग ज़ेब
ग़ज़ल
इस घर के चप्पे चप्पे पर छाप है रहने वाले की
मेरे जिस्म में मुझ से पहले शायद कोई रहता था
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ग़ज़ल
तुम्हारे दर्द-ए-सर से संदली-रंगो अगर जी दूँ
तू छापे क़ब्र पर देना मिरी तुम आ के संदल के