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ग़ज़ल
परदेसी सूनी आँखों में शो'ले से लहराते हैं
भाबी की छेड़ों सा बादल आपा की चुटकी सा चाँद
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
शोख़ कर दिया है छेड़ों से हम ने तुम को
कुछ हौसले हमारे तुम ने बढ़ा दिए हैं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
मिरी दिल की तबाही की शिकायत पर कहा उस ने
तुम अपने घर की चीज़ों की हिफ़ाज़त क्यूँ नहीं करते
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़्मा छेड़ूँ
या तिरे दर्द-ए-जुदाई का गिला पेश करूँ
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
और तो मुझ को मिला क्या मिरी मेहनत का सिला
चंद सिक्के हैं मिरे हाथ में छालों की तरह