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ग़ज़ल
कमर-ए-यार के मज़कूर को जाने दे मियाँ
तू क़दम इस में न रख राह ये बारीक है दिल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
पूछते हो हाल क्या मेरा क़िमार-ए-इश्क़ में
झाड़ बैठा हाथ मैं नक़्द-ए-दिल-ओ-दीं हार के
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
क़िमार-ए-इश्क़ में सब कुछ गँवा दिया मैं ने
उम्मीद-ए-नफ़ा में ख़ौफ़-ए-ज़ियाँ नहीं होता