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ग़ज़ल
ज़माने को हिला देने के दावे बाँधने वालो
ज़माने को हिला देने की ताक़त हम भी रखते हैं
जोश मलसियानी
ग़ज़ल
हूँ ज़ुहूरी के मुक़ाबिल में ख़िफ़ाई 'ग़ालिब'
मेरे दावे पे ये हुज्जत है कि मशहूर नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मुझ को मारा है हर इक दर्द ओ दवा से पहले
दी सज़ा इश्क़ ने हर जुर्म-ओ-ख़ता से पहले
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
रह-ओ-रस्म क़ल्ब ओ निगाह के वो तुम्हारे दावे निबाह के
वो हमारा शेख़ी बघारना तुम्हें याद हो कि न याद हो
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़ज़ल
ज़बरदस्ती तो देखो हाथ रख कर मेरे सीने पर
वो किस दा'वे से कहते हैं हमारा ही तो ये दिल है
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
ज़ुल्म से रक्खे काम हमेशा दा'वे करता जाए वफ़ा का
कौन ज़माने में है ऐसा मैं ही मैं हूँ तू ही तू है