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ग़ज़ल
एक मद्धम आँच सी आवाज़ सरगम से अलग कुछ
रंग इक दबता हुआ सा पूरे मंज़र में अकेला
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
लचक पत्थर में गर होती तो फिर पत्थर न कहलाता
वो दबता पर उभर जाने का इस में हौसला होता
अब्दुर्रज़्ज़ाक़ दिल
ग़ज़ल
जैसे मैं दबता जाता हूँ उन आँखों के बोझ तले
दिल पर दो अश्कों का इक एहसान उभरता आता है
अब्दुल अहद साज़
ग़ज़ल
तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है