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ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
मैं शहर-ए-दिल से निकला हूँ सब आवाज़ों को दफ़ना कर
'नदीम' अब कौन देता है सदा आहिस्ता आहिस्ता
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
जो अपनी मर्ज़ी का सोचें तुम उन को दफ़ना दो
कि ऐसी लड़कियाँ कब रुख़्सती के क़ाबिल हैं
सबाहत उरूज
ग़ज़ल
कोई इतना न होगा लाश भी ले जा के दफ़ना दे
इन्हीं सड़कों पे मर जाएगा इंसाँ हम न कहते थे
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
आने वाले कल की ख़ातिर हर हर पल क़ुर्बान किया
हाल को दफ़ना देते हैं हम जीने की तय्यारी में
अज़रा नक़वी
ग़ज़ल
बे-ख़्वाब ''ख़ून-आँख'' में दफ़ना के ज़ख़्म-ए-ख़्वाब
मिलने को है सहर से ये शब भी गले चलो