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ग़ज़ल
खड़े चुप हो देखते क्या मिरे दिल उजड़ गए को
वो गुनह तो कह दो जिस से ये दह-ए-ख़राब उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
हैं कहाँ आह वो हूरान-ए-तसव्वुर जिन से
दिल था ग़ैरत-दह-ए-गुलज़ार-ए-जिनाँ आज की रात
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ग़ज़ल
धमक वो आह के नारे की अपने है कि गर्दूं से
सितारे टूटे पड़ते हैं कुएँ जाते हैं दह दह कर
वलीउल्लाह मुहिब
ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन
न तिरी हिकायत-ए-सोज़ में न मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में