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ग़ज़ल
दर्द-ए-बे-दर्द है बेहिस हैं हिसों के पैकर
दिल की आवाज़ है शीशों को भी पत्थर कहिए
असरार अकबराबादी
ग़ज़ल
अब ऐ बे-दर्द क्या इस के लिए इरशाद होता है
फिर अपनी ख़ाक से पैदा दिल-ए-बर्बाद होता है
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
किस क़ुव्वत-ए-बे-दर्द का इज़हार है दुनिया
हर दिल को गिला है कि दिल-आज़ार है दुनिया
नज़ीर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
हमेशा जिस से पहुँचता रहे था दिल को अलम
हज़ार शुक्र कि वो दर्द-ए-बे-दवा न रहा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
तुझ को भी ज़िंदगी ने दिया दर्द-ए-बे-कराँ
मैं भी ग़म-ए-हयात का लज़्ज़त-चशीदा हूँ