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ग़ज़ल
शु'ऊर-ए-शे'र-ओ-अदब दर्क-ए-मा'नी फ़हम-ए-बदी'
मज़ाक़-ए-लुत्फ़-ए-बयाँ का भी हुस्न-ए-ज़न है मुझे
शाही अररयावी
ग़ज़ल
पीते हैं जाम-ए-होश-ओ-ख़िरद से ब-याद-ए-यार
मशरूब-ए-दर्क-ए-मस्ती-ओ-अस्बाब-ए-दाम बस
अख़लाक़ अहमद आहन
ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले