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ग़ज़ल
ये वज़्अ' क्या है कि होते नहीं हो दस्त-बसर
अभी से अपनों का लेना सलाम भूल गए
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
ये दस्त-बसर रहने का 'आरिफ़' वो महल है
उस जा कफ़-ए-अफ़्सोस भी मलने नहीं देते
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
ग़ज़ल
मुंकिर-ए-मय था शैख़ कल आज ये हाल है कि है
जाम-ब-दस्त-ओ-ख़ुम-ब-सर शीशा-ब-लब-ओ-ब-दोश
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
आज ख़ूँ हो के टपक पड़ने के नज़दीक है दिल
नोक-ए-नश्तर हो तो हाँ क़ाबिल-ए-तहरीक है दिल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
क़यामत है शब-ए-वादा का इतना मुख़्तसर होना
फ़लक का शाम से दस्त-ओ-गरेबान-ए-सहर होना