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ग़ज़ल
कार-गर दस्त-ए-जफ़ा-कार रहेगा कब तक
गर्म ये ज़ुल्म का बाज़ार रहेगा कब तक
प्रेम नारायण सक्सेना राज़
ग़ज़ल
कुछ इम्तिहान-ए-दस्त-ए-जफ़ा कर चुके हैं हम
कुछ उन की दस्तरस का पता कर चुके हैं हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
बहुत कुछ दोस्तो बिस्मिल के चुप रहने से होता है
फ़क़त उस ख़ंजर-ए-दस्त-ए-जफ़ा से कुछ नहीं होता
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
संग-ए-जफ़ा का ग़म नहीं दस्त-ए-तलब का डर नहीं
अपना है उस पर आशियाँ नख़्ल जो बारवर नहीं
नज़्म तबातबाई
ग़ज़ल
काट कर दस्त-ए-दुआ को मेरे ख़ुश हो ले मगर
तू कहाँ आख़िर ये शाख़-ए-बे-समर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
लुत्फ़-ए-जफ़ा-ए-दोस्त का कैसे अदा हो शुक्रिया
लज़्ज़त-ए-सोरिश-ए-जिगर देने लगी दुआ कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
दस्त-ए-क़ातिल में कोई तेग़ न ख़ंजर होता
मिरा साया जो मिरे क़द के बराबर होता
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
अब वा'इज़-ओ-ज़ाहिद हैं बहम दस्त-ओ-गरेबाँ
इक जंग-ए-जमल आज मसाजिद में छिड़ी है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
मिरी क़िस्मत लिखी जाती थी जिस दिन मैं अगर होता
उड़ा ही लेता दस्त-ए-कातिब-ए-तक़दीर से काग़ज़