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ग़ज़ल
बू-ए-गुल पत्तों में छुपती फिर रही थी देर से
ना-गहाँ शाख़ों में इक दस्त-ए-सबा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मिलते हैं रोज़ दस्त-ए-सबा से पयाम-ए-गुल
ज़िंदाँ में भी क़रीब हैं अहल-ए-चमन से हम
हिमायत अली शाएर
ग़ज़ल
दस्त-ए-सबा ने फिर से मेरे दामन में महका दी हैं
चटकी कलियाँ भीनी ख़ुशबू तेरी बातें तन्हाई
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
ग़ज़ल
खिलते रहे हैं जो गुल बाद-ए-ख़िज़ाँ की शह पर
दस्त-ए-सबा ने बढ़ कर उन को मसल दिया है
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ग़ज़ल
हम चश्म-ए-सहर, दीदा-ए-शब, दस्त-ए-सबा हैं
पर्दा तो है ना-महरमों से लाला-अज़ारो!
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
ग़ज़ल
दस्त-ए-सबा कट न जाए लौह-ओ-क़लम छिन न जाएँ
अज़्मत-ए-फ़न बा-वक़ार देखिए कब तक रहे