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ग़ज़ल
नूह नारवी
ग़ज़ल
मक़्तल में ये तमाशा उस के नया में देखा
ईधर को धड़ पड़े हैं ऊधर को सर पड़े हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
लोग तो कहते थे लेकिन मैं भी तो अंधा न था
मैं ने ख़ुद देखा है मेरे धड़ पे भी चेहरा न था
शीन काफ़ निज़ाम
ग़ज़ल
मय-कदे में मस्त हैं और शोर उन का हाओ हो
मदरसे में शैख़ हैं और वाए-वैला तौबा धाड़