आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "dhalte"
ग़ज़ल के संबंधित परिणाम "dhalte"
ग़ज़ल
जाने बस्ती का वो इक मोड़ था क्या उस के लिए
शाम ढलते ही वहाँ शम्अ' जला देता था
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन है
तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैं ने देखा है