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ग़ज़ल
वस्ल के दो-चार लम्हे रोज़ गिन-गिन देखना
रह गया था ज़िंदगी में क्या यही दिन देखना
ज्ञानेंद्र विक्रम
ग़ज़ल
बेच दी क्यूँ ज़िंदगी दो-चार आने के लिए
एक दो लम्हा तो रखता मुस्कुराने के लिए