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ग़ज़ल
हबीबुर्रहमान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
इक़बाल सफ़ी पूरी
ग़ज़ल
तुम्हारे पाँव तो दो-गाम चल कर लड़खड़ाते हैं
हमारे अज़्म-ए-मोहकम में कभी लग़्ज़िश नहीं होती
सय्यद आरिफ़ अली
ग़ज़ल
घटा कर क़ैद-ए-आज़ादी बढ़ा दो ग़म असीरी का
क़फ़स को आशियाँ में या क़फ़स में आशियाँ रख दो