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ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
ग़ज़ल
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दोहराती है
अच्छा मेरा ख़्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो
अंदलीब शादानी
ग़ज़ल
लाल डोरे तिरी आँखों में जो देखे तो खुला
मय-ए-गुल-रंग से लबरेज़ हैं पैमाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
ग़ज़ल
औरों की मोहब्बत के दोहराए हैं अफ़्साने
बात अपनी मोहब्बत की होंटों पे नहीं आई