तुम पे सूरज की किरन आए तो शक करता हूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

तुम पे सूरज की किरन आए तो शक करता हूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

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    तुम पे सूरज की किरन आए तो शक करता हूँ

    चाँद दहलीज़ पे रुक जाए तो शक करता हूँ

    मैं क़सीदा तिरा लिक्खूँ तो कोई बात नहीं

    पर कोई दूसरा दोहराए तो शक करता हूँ

    उड़ते उड़ते कभी मासूम कबूतर कोई

    आप की छत पे उतर जाए तो शक करता हूँ

    फूल के झुण्ड से हट कर कोई प्यासा भँवरा

    तेरे पहलू से गुज़र जाए तो शक करता हूँ

    ''शिव'' तो एक तराशी हुई मूरत है मगर

    तू उन्हें देख के शरमाए तो शक करता हूँ

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    नोमान शौक़

    नोमान शौक़,

    नोमान शौक़

    तुम पे सूरज की किरन आए तो शक करता हूँ नोमान शौक़

    स्रोत :
    • पुस्तक : Chandi Ka waraq (पृष्ठ 72)
    • रचनाकार : Ahmad Kamal Parvazi
    • प्रकाशन : Surkhwab Publication (2009)
    • संस्करण : 2009

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