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ग़ज़ल
सज्दा-गाह-ए-अहल-ए-दिल बा'द-ए-फ़ना हो जाइए
सफ़्हा-ए-हस्ती पे इक नक़्श-ए-वफ़ा हो जाइए
हिरमाँ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
अहल-ए-दिल भी देखिए अब क्या से क्या करने लगे
शीशागर भी पत्थरों से मशवरा करने लगे
अब्दुल्लाह बहार
ग़ज़ल
अहल-ए-दिल इल्ज़ाम है ये और बहुत संगीन है
उस को कहते कब सुना वो हिज्र में ग़मगीन है
शहराम सर्मदी
ग़ज़ल
न अहल-ए-दिल से न अहल-ए-नज़र से मिलता है
शुऊर-ए-ज़ात फ़क़त अपने दर से मिलता है
प्रकाश नाथ प्रवेज़
ग़ज़ल
अहल-ए-दिल मिलते नहीं अहल-ए-नज़र मिलते नहीं
ज़ुल्मत-ए-दौराँ में ख़ुर्शीद-ए-सहर मिलते नहीं
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
अहल-ए-दिल मुश्किल में हैं अहल-ए-नज़र मुश्किल में हैं
आज मैं क्या मेरे सारे हम-सफ़र मुश्किल में हैं
असद भोपाली
ग़ज़ल
तुम अहल-ए-दिल हो सो दिल में रखा हमारा नाम
वगर्ना हम भी हैं क्या और क्या हमारा नाम
धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़
ग़ज़ल
समझ सकते हों अहल-ए-दिल तो ये राज़-ए-निहाँ समझें
ब-जुज़ नक़्स-ए-नज़र पर्दा न कोई दरमियाँ समझें
अकमल जालंधरी
ग़ज़ल
तुम अहल-ए-दिल हो सो दिल में रखा हमारा नाम
वगर्ना हम भी हैं क्या और क्या हमारा नाम