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ग़ज़ल
अदू-ए-दीन-ओ-ईमाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-अमाँ निकले
तिरे पैकाँ बड़े जाबिर बड़े ना-मेहरबाँ निकले
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ग़ज़ल
ये तेरी बे-ज़री और हासिदों का ये हसद तौबा
अगर ऐ 'अम्न' तेरे पास ज़र होता तो क्या होता
अम्न लख़नवी
ग़ज़ल
हर इक ठोकर पे है ऐ 'अम्न' लग़्ज़िश का गुमाँ मुझ को
हर इक पत्थर नज़र संग-ए-दर-ए-मय-ख़ाना आता है
अम्न लख़नवी
ग़ज़ल
दुश्मन-ए-दीं दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-सुकूँ
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे हो गए
गुलज़ार देहलवी
ग़ज़ल
तिरे तेवर बदलते ही ज़माना हो गया दुश्मन
हिलाल-ए-ईद भी ज़ाहिर हुआ शमशीर की सूरत
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ऐसी बस्ती में मियाँ अम्न-ओ-अमाँ का क्या सवाल
सुल्ह-जू कम हों जहाँ पर और बलवाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
इस दौर में सुकून-ओ-क़रार-ओ-क़ियाम-ए-अम्न
'ख़ालिद' मुझे तो लगता है वहम-ओ-गुमान सा