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ग़ज़ल
और कोई बात सर-ए-बज़्म-ए-सुख़न कब निकली
बस तिरी बात ही निकली है यहाँ जब निकली
मेहदी बाक़र ख़ान मेराज
ग़ज़ल
बे-इख़्तियार हम जो सर-ए-बज़्म रो दिए
कितने सुनहरे ख़्वाब इन आँखों ने खो दिए
महेंद्र प्रताप चाँद
ग़ज़ल
उस की आँखों ने सर-ए-बज़्म ठहरने न दिया
सब्र मज़लूम को ज़ालिम की नज़र ने न दिया
सय्यद ग़ुलाम मोहम्मद मस्त कलकत्तवी
ग़ज़ल
सर-ए-बज़्म-ए-तलब रक़्स-ए-शरर होने से डरती हूँ
कि मैं ख़ुद पर मोहब्बत की नज़र होने से डरती हूँ
रेहाना क़मर
ग़ज़ल
हर ज़र्रा चश्म-ए-शौक़-ए-सर-ए-रहगुज़र है आज
दिल महव-ए-इंतिज़ार है और किस क़दर है आज
हमीद नागपुरी
ग़ज़ल
बुझा बुझा सा चराग़-ए-सर-ए-मज़ार हूँ में
ख़िज़ाँ ने जिस को सँवारा है वो बहार हूँ मैं