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ग़ज़ल
दिखावे के लिए एलान-ए-फ़ैज़-ए-आम होता है
मगर इक ख़ास ही हल्क़ा में दौर-ए-जाम होता है
जुर्म मुहम्मदाबादी
ग़ज़ल
हुस्न को आख़िर ख़याल-ए-फ़ैज़-ए-आम आ ही गया
आज कोई ख़ुद-बख़ुद बाला-ए-बाम आ ही गया
साहिर सियालकोटी
ग़ज़ल
पैग़ाम-ए-लुत्फ़-ए-ख़ास सुनाना बसंत का
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-आम बहाना बसंत का
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ग़ज़ल
देखा गया न मुझ से मआनी का क़त्ल-ए-आम
चुप-चाप मैं ही लफ़्ज़ों के लश्कर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
'फ़ाज़िल'-ए-नाचीज़ क्या था एक क़तरा था मगर
तेरे फ़ैज़-ए-आम ने क़तरे को दरिया कर दिया
फ़ाज़िल काश्मीरी
ग़ज़ल
करम करम है तो है फ़ैज़-ए-आम इस का शिआ'र
ये दश्त है वो गुलिस्ताँ सहाब क्या जाने