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ग़ज़ल
दिल किसी फ़र्द-ए-बशर का ख़ाली इस ग़म से नहीं
ग़म ये शाए कू-ब-कू ख़ाना-ब-ख़ाना हो गया
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
इक जुर्म और फ़र्द-ए-जराएम में बढ़ गया
या'नी न दर्द-ए-दिल का हो इज़हार आज-कल