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ग़ज़ल
तुम्हें उस से मोहब्बत है तो हिम्मत क्यूँ नहीं करते
किसी दिन उस के दर पे रक़्स-ए-वहशत क्यूँ नहीं करते
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द
कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द
फ़रहत अब्बास शाह
ग़ज़ल
मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं
और इस के बअ'द गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं