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ग़ज़ल
बारगाह-ए-हुस्न में ऐ 'बर्क़' फ़र्त-ए-रोब से
याद है अब तक वो अपनी बे-ज़बानी याद है
शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी
ग़ज़ल
फ़र्त-ए-सोज़-ए-उल्फ़त में देख कर सकूँ दिल का
बिजलियाँ मचलती हैं बादलों के महशर में
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
फ़र्त-ए-हुजूम-ए-ख़ल्क़ से हों बंद रास्ते
वो रश्क-ए-यूसुफ़ आए जो बाज़ार की तरफ़
राजा गिरधारी प्रसाद बाक़ी
ग़ज़ल
बे-ज़बाँ ज़ख़्मों को फ़र्त-ख़्वाहिशात-ए-ज़ीस्त को
जो न समझा ग़ैर-ज़िम्मेदार वो समझा गया
हसीर नूरी
ग़ज़ल
यहाँ उठता नहीं है पाँव फ़र्त-ए-ना-तवानी से
वहाँ चलने को है तय्यार मीर-ए-कारवाँ अपना
फ़ाज़िल काश्मीरी
ग़ज़ल
ये फ़र्त-ए-गिर्या-ओ-ज़ारी का है असर 'मंशा'
ज़मीं मकानों की गीली है नम हैं दीवारें
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
ग़ज़ल
'अनीस' एहसास-ए-दर्द-ओ-फ़र्त-ए-मायूसी को क्या कहिए
कि अब आँसू भी मेरी आँख से कमतर निकलते हैं
सय्यद अनीसुद्दीन अहमद रीज़वी अमरोहवी
ग़ज़ल
यूँ फ़र्त-ए-बे-ख़ुदी से मोहब्बत में जान दे
तुझ को भी कुछ ख़बर न हो इस वारदात की